अमेरिका ने शनिवार 20 सितंबर को एच-1बी वीजा की फीस को बढ़ाने की घोषणा की थी। इसके बाद भारत सरकार ने इस मुद्दे पर भारतीय आईटी कंपनियों की राय जानना चाहती थी। अमेरिका के एच-1 बी वीजा फीस बढ़ोत्तरी के फैसले के बाद भारत की प्रमुख आईटी कंपनियों ने एच-1बी वीजा पर निर्भरता को कम करने का निर्णय लिया है।
भारत-अमेरिका के मध्य ट्रेड डील को लेकर चल रही खींचतान के बीच अमेरिका ने एच-1बी वीजा कार्यक्रम को बदलने की घोषणा कर दी है। अब कंपनियों को प्रत्येक एच-1बी आवेदन के लिए एक लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) का अतिरिक्त भुगतान करना होगा। इस बीच प्रमुख भारतीय आईटी कंपनियों ने अब एच-1बी वीजा पर निर्भरता को बेहद कम करने का निर्णय लिया है। आईटी कंपनियां भारत में काम शिफ्ट करने की तैयारी पर जोर देते हुए दिखाई दे रही है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि,अमेरिका के इस फैसले से थोड़े समय के लिए भारतीय आईटी कंपनियों को जरूर नुकसान होगा। लेकिन इससे भविष्य में उनके लिए नया रास्ता खुल सकता है। इस निर्णय के चलते अमेरिका से भारत में आउटसोर्सिंग बढ़ सकती है। भारतीय आईटी कंपनियां पहले ही 90 प्रतिशत काम अमेरिका से बाहर के केंद्रों से कर रही हैं। इसे 95 प्रतिशत तक ले जाना संभव है। यानी अमेरिका की सख्ती से भारत को फायदा हो सकता है।
दरअसल, अमेरिका ने शनिवार 20 सितंबर को एच-1बी वीजा की फीस को बढ़ाने की घोषणा की थी। इसके बाद भारत सरकार ने इस मुद्दे पर भारतीय आईटी कंपनियों की राय जानना चाहती थी। अमेरिका के एच-1 बी वीजा फीस बढ़ोत्तरी के फैसले के बाद भारत की प्रमुख आईटी कंपनियों ने एच-1बी वीजा पर निर्भरता को कम करने का निर्णय लिया है। टॉप कंपनियों ने इस मामले में सरकार को अपनी जानकारी भी दे दी है। कंपनियों ने सरकार को बताया कि,वह अपने अमेरिकी ग्राहकों को दी जाने वाली सेवाओं से संबंधित कार्यों को भारत में लाने की प्लानिंग बना रही है।
आईटी मंत्रालय, विदेश मंत्रालय समेत अन्य संबंधित मंत्रालयों से आईटी कंपनियों ने कहा है कि भारतीय आईटी कंपनियां आने वाले दिनों में एच-1बी वीजा पर अपनी निर्भरता को काफी कम कर देंगी। कंपनियों ने यह भी कहा कि वे अमेरिका में आए दिन हो रहे नीतिगत बदलाव में नहीं उलझना चाहती है। इससे भविष्य में कंपनी करोबारी प्लानिंग प्रभावित हो सकती है।
भारत को हो सकता है ये फायदा
- भारत टैलेंट हब बनकर उभरेगा, इससे मेड इन इंडिया इनोवेशन को फायदा मिलेगा
- भारत एक ग्लोबल इनोवेशन हब बन सकता है। इससे इकोनॉमी मजबूत होगी
- देश में दुनिया की बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां का निवेश बढ़ेगा।
- एआई, रिसर्च, साइबर सिक्योरिटी, चीप डिजाइन में नई जॉब के अवसर खुल सकते है।

इन कंपनियों के लिए बढ़ सकती है मुसीबत
अमेरिका द्वारा बड़ी संख्या में एच-1बी वीजा वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों को जारी किए जाते है। इसमें विशेष रूप से अमेजॉन, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, ऐपल, गूगल, वॉलमार्ट और जेपी मॉर्गन जैसी टॉप कंपनियां शामिल है। शीर्ष दस कंपनियों को जारी 95,109 एच-1बी वीजा में 94.3 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी इन कंपनियों की है। इस लिहाज से शीर्ष 10 कंपनियों की सूची में केवल एक भारतीय कंपनी है।
लेकिन एच-1बी वीजा शुल्क में की गई भारी बढ़ोतरी से भारतीय आईटी कंपनियां भी प्रभावित होंगी।अमेरिकी सरकार के 30 जून, 2025 तक के उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो टीसीएस 5,505 एच-1बी वीजा के साथ शीर्ष 100 की सूची में दूसरे पायदान पर है। वह केवल अमेजॉन से पीछे है। इसी प्रकार इन्फोसिस 2,004 एच-1बी वीजा के साथ 13वें पायदान पर और एलटीआई माइंडट्री 1,844 वीजा के साथ 15वें स्थान पर है। शीर्ष 100 की सूची में शामिल अन्य कंपनियों में एचसीएल अमेरिका, विप्रो, टेक महिंद्रा और एल एंड टी टेक्नोलॉजी सर्विसेज शामिल हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत की शीर्ष 7 कंपनियों ने कुल मिलाकर 13,870 एच-1बी वीजा प्राप्त किए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि, इसके अलावा दर्जनों छोटी-बड़ी आईटी कंपनियां हैं जो अमेरिकी क्लाइंट को अपनी सेवाएं देती हैं, उन पर भी परोक्ष तौर पर असर होगा। यह आईटी सेक्टर में रोजगार की तलाश करने वाले भारतीय पेशेवरों के विकल्पों को सीमित कर सकता है। नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत और इंफोसिस के निदेशक बोर्ड के सदस्य मोहनदास पई जैसे कई विशेषज्ञों का कहना है कि अब बेहद प्रतिभाशाली भारतीयों को स्वदेश लौटना पड़ सकता है जिसका फायदा भारत को दीर्घकालिक तौर पर होगा। स्वदेश लौटी प्रतिभाएं भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में मदद कर सकती हैं।
क्या होता एच-वन वीजा? इस प्रक्रिया से होते है जारी
एच वन वीजा एक एक नॉन-इमिग्रेंट वीजा है। यह वीजा लॉटरी के जरिए दिए जाते रहे हैं क्योंकि हर साल कई सारे लोग इसके लिए आवेदन करते हैं। यह वीजा स्पेशल टेक्निकल स्किल जैसे आईटी, आर्किटेक्चर और हेल्थ जैसे प्रोफेशन वाले लोगों के लिए जारी होता है। अमेरिकी सरकार हर साल 85,000 एच-1बी वीजा जारी करती है, जिनका इस्तेमाल ज्यादातर तकनीकी नौकरियों में होता है। इस साल के लिए आवेदन पहले ही पूरे हो चुके हैं।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल एच-वन बी वीजा का सबसे ज्यादा फायदा भारत को मिला। हालांकि इस वीजा कार्यक्रम की आलोचना भी होती है। कई अमेरिकी तकनीकी कर्मचारियों का कहना है कि कंपनियां एच-वन बी वीजा का इस्तेमाल वेतन घटाने और अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियां छीनने के लिए करती हैं। H-1B वीजा के नियमों में बदलाव से 2,00,000 से ज्यादा भारतीय प्रभावित होंगे। साल 2023 में H-1B वीजा लेने वालों में 1,91,000 लोग भारतीय थे। ये आंकड़ा 2024 में बढ़कर 2,07,000 हो गई।
भारत की आईटी/टेक कंपनियां हर साल हजारों कर्मचारियों को एच-वन बी वीजा पर अमेरिका भेजती हैं। हालांकि, अब इतनी ऊंची फीस पर लोगों को अमेरिका भेजना कंपनियों के लिए कम फायदेमंद साबित होगा। भारतीय एच-वन बी वीजा धारक हैं और यह नई फीस उनके लिए बड़ा आर्थिक बोझ बन सकती है। खासकर मिड-लेवल और एंट्री-लेवल कर्मचारियों को वीजा मिलना मुश्किल होगा। कंपनियां नौकरियां आउटसोर्स कर सकती हैं, जिससे अमेरिका में भारतीय पेशेवरों के अवसर कम होंगे।
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