बदरीनाथ धाम में मंगसीर (नवंबर) माह की एक पूजा की धार्मिक परंपरा है। अत्यधिक बर्फबारी होने पर भी यह परंपरा निभाई जाती है।
बदरीनाथ मंदिर के कपाट बंद होने के बाद विभिन्न धार्मिक परंपराओं का निर्वहन होता है। इन परंपराओं में एक है बदरीनाथ की मंगसीर (नवंबर) माह की पूजा। बदरीनाथ मंदिर में मंगसीर माह की पूजा संपन्न होने के बाद चारों ओर से धाम के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। अत्यधिक बर्फबारी होने के बाद भी मंगसीर माह की पूजा की परंपरा संपन्न की जाती है।

कॉकरोच को भी लगता है भोग
मंदिर में भगवान बदरीनाथ को भोग लगने के साथ ही तप्तकुंड के पास गरुड़ शिला के नीचे काॅकरोच को भी भोग लगाया जाता है। इसके अलावा गाय और पक्षियों को भी भोग अर्पित किया जाता है। यह माना जाता है कि नारायण को भोग लगाने से पहले संसार में हर जीव की तृप्ति होनी चाहिए।
पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल बताते हैं कि जब बदरीनाथ मंदिर का निर्माण नहीं हुआ था तब बदरीनाथ भगवान की पूजा तप्तकुंड के समीप गरुड़ शिला स्थित है। शंकराचार्य ने बदरीनाथ की पद्मासन शिला को तप्तकुंड से उठाकर इस शिला के नीचे रख दिया था जहां कॉकरोच रहते थे। मंदिर की स्थापना होने के बाद से ही कॉकरोच को भी प्रतिदिन भोग लगाया जाता है। इस भोग प्रक्रिया का मंदिर के दस्तूर में भी उल्लेख है।
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