कांग्रेस ने बीजेपी सरकार को ज्वलंत मुद्दों पर ध्यान देने की सलाह दी, बीजेपी बोली सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने को प्रतिबद्ध
देहरादून: उत्तराखंड में महिला आरक्षण से जुड़े संशोधित बिल पर अभी बहस कुछ कम होती दिखी ही रही थी कि निंदा प्रस्ताव की चर्चा ने इसे फिर गर्म कर दिया. दरअसल चर्चा है कि सरकार जल्द ही विधानसभा का विशेष सत्र बुला सकती है, जिसमें महिला आरक्षण का संशोधित बिल संसद में पास नहीं हो पाने के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया जा सकता है.
निंदा प्रस्ताव की चर्चा ने गर्म किया राजनीतिक माहौल: उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर महिला आरक्षण का मुद्दा केंद्र में आ गया है. पहले जहां नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 से जुड़े संशोधित बिल पर बहस धीरे-धीरे ठंडी पड़ती दिखाई दे रही थी, वहीं अब निंदा प्रस्ताव की संभावित चर्चा ने राजनीतिक माहौल को फिर से गरमा दिया है. माना जा रहा है कि धामी सरकार इस मुद्दे को लेकर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है, जिसमें केंद्र में बिल पारित न हो पाने के विरोध में निंदा प्रस्ताव लाया जा सकता है.
महिला आरक्षण से जुड़े संशोधित बिल पर घमासान: दरअसल महिला आरक्षण से जुड़े संशोधित बिल को संसद में दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया, जिसके चलते यह पारित नहीं हो सका. इसके बाद से ही भारतीय राजनीति में इस मुद्दे को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गए. भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों ने विपक्ष पर महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी करने का आरोप लगाया, जबकि विपक्ष ने सरकार की रणनीति और मंशा पर सवाल खड़े किए.
सीएम ने विपक्ष के रवैए की आलोचना की: उत्तराखंड में भी इस मुद्दे की गूंज साफ सुनाई दे रही है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मामले पर केंद्र सरकार के प्रयासों का समर्थन करते हुए विपक्षी दलों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन विपक्ष का रवैया इस दिशा में बाधा बन रहा है.
विधानसभा के विशेष सत्र की संभावना: हालांकि यह मामला शांत होता नजर आ रहा था, लेकिन जैसे ही विधानसभा के विशेष सत्र की संभावनाएं सामने आईं, यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया. राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि राज्य सरकार इस विशेष सत्र के जरिए एक निंदा प्रस्ताव पारित कर केंद्र को संदेश देना चाहती है कि महिला आरक्षण के मुद्दे पर राज्य की स्पष्ट राय क्या है.
पहले भी बुलाए जाते रहे हैं विशेष सत्र: विशेष सत्र बुलाने की परंपरा नई नहीं है. कई बार राज्यों द्वारा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए विशेष सत्र बुलाए जाते हैं और प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजे जाते हैं. इसी कड़ी में उत्तराखंड सरकार भी महिला आरक्षण के मुद्दे पर अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता दिखाने की तैयारी में है.
अभी सरकार ने नहीं की कोई आधिकारिक घोषणा: हालांकि अभी तक राज्य सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है. बावजूद इसके राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है और यह मुद्दा फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है.
कांग्रेस की सलाह ज्वलंत मुद्दों पर ध्यान दे सरकार: कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का कहना है कि-
गोदियाल बोले बीजेपी को कांग्रेस फोबिया हो गया है: गणेश गोदियाल ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा महिला आरक्षण के मुद्दे को केवल राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है. उनके मुताबिक भाजपा नेताओं को कांग्रेस फोबिया हो गया है और वे हर मुद्दे को राजनीतिक लाभ के नजरिए से देख रहे हैं.
बीजेपी ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया: उधर भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज किया है. भाजपा विधायक विनोद चमोली ने कहा कि-
संसद में महिला आरक्षण से जुड़े संशोधित बिल के खिलाफ विपक्ष का रुख साफ दर्शाता है कि कांग्रेस महिलाओं को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के पक्ष में नहीं है. उन्होंने कांग्रेस से यह भी सवाल किया कि वह परिसीमन प्रक्रिया का विरोध क्यों कर रही है, जो महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में एक अहम कदम माना जाता है.
-विनोद चमोली विधायक भाजपा-
चमोली बोले बीजेपी सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने को प्रतिबद्ध: भाजपा का कहना है कि केंद्र सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है और महिला आरक्षण बिल इसी दिशा में एक बड़ा कदम है. पार्टी नेताओं के अनुसार विपक्ष इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग दे रहा है.
महिला आरक्षण का मुद्दा बहस का केंद्र बना: उत्तराखंड में महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है. विशेष सत्र और निंदा प्रस्ताव की चर्चाओं ने इसे और अधिक संवेदनशील बना दिया है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वास्तव में सरकार विशेष सत्र बुलाती है और यदि हां तो उसमें क्या निर्णय लिए जाते हैं.
फिलहाल इतना तय है कि महिला आरक्षण का मुद्दा न केवल राष्ट्रीय राजनीति बल्कि राज्य की राजनीति में भी लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहेगा और इसके जरिए राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों को धार देने में जुटे रहेंगे.
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