भागीरथी कैचमेंट के जंगलों की सेहत को लेकर बड़ी स्टडी की गई है, जिसमें कई चौंकाने वाली बात सामने आई है. रिपोर्ट- रोहित सोनी.
देहरादून: गढ़वाल हिमालय के भागीरथी कैचमेंट के जंगलों की सेहत ठीक नहीं है. पेड़ तो खड़े हैं, लेकिन उनकी नई पीढ़ी यानी छोटे पौधे और बीज कम हो रहे हैं. हेमवती नंदन बहुगुणा (एचएनबी) गढ़वाल विश्वविद्यालय के नए अध्ययन में सामने आया है कि जंगलों में कटाई, पेड़ों की शाखाएं काटना, अत्यधिक चराई, पत्तियों की सफाई, जंगल की आग और अस्थायी लकड़ी के ढांचों के निर्माण से पेड़ों का प्राकृतिक रूप से उगना (Natural regeneration) प्रभावित हो रहा है.
संकट में 22.60 फीसदी से ज्यादा प्रजातियां: हैरानी की बात ये है कि 22.60 फीसदी से ज्यादा प्रजातियों में तो बीज और छोटे पौधे बिल्कुल भी नहीं मिले, यानी ये पेड़ सिर्फ बड़े आकार में मौजूद हैं, लेकिन इनकी अगली पीढ़ी तैयार नहीं हो रही है.
दरअसल, एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने उत्तरकाशी और टिहरी जिले के 24 जंगलों का अध्ययन किया. ये अध्ययन एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय उत्तराखंड के शोधकर्ताओं यशवंत सिंह राणा, ओम प्रकाश तिवारी और चंद्र मोहन शर्मा ने किया है, जिनका शोधपत्र Forest structure and regeneration responses to altitudinal and disturbance gradients in the temperate Garhwal Himalaya नाम से 28 सितंबर 2026 को Discover Forests में प्रकाशित हुआ.
अध्यनय के लिए 24 जंगलों की चयन किया था: अध्ययन में पाया गया कि अगर ऐसे ही हालात रहे तो आने वाले समय में इन पेड़ों की आबादी घट सकती है और कुछ प्रजातियां स्थानीय स्तर पर खत्म भी हो सकते हैं. शोधकर्ताओं ने 1,500 मीटर से लेकर 3,000 मीटर ऊंचाई वाले 24 जंगलों का चयन किया. इनमें कम, मध्यम और ज्यादा प्रभावित जंगल शामिल थे.
- बड़े पेड़ों को गिनने के लिए 10×10 मीटर के प्लॉट.
- छोटे पौधों के लिए 5×5 मीटर के छोटे प्लॉट.
- बीजों से निकले नन्हे पौधों को गिनने के लिए 2×2 मीटर के प्लॉट बनाए गए.
- पेड़ों की मोटाई के आधार पर उनकी उम्र और संरचना का पता लगाया गया.
जानिए स्टडी के लिए किन पेड़ों की शामिल किया गया: मुख्य रूप से इस अध्ययन में देवदार, बांज की तीन प्रजातियां, बुरांश, हिमालयी फर, ब्लू पाइन, चीर, टैक्सस, भोजपत्र और मेपल पेड़ को शामिल किया गया था. अध्ययन में गांव-बस्तियों के पास और कम ऊंचाई वाले जंगलों में इंसान का दबाव सबसे ज्यादा पाया गया. यहां लोग ईंधन और चारे के लिए लकड़ी और पत्तियां इकट्ठा करते हैं. पशु चराते हैं. पेड़ों की शाखाएं काटते हैं और कभी-कभी आग भी लगा देते हैं, जिसके चलते इसका सीधा असर नए पौधों पर पड़ रहा है यानी नए पौधे ठीक से नहीं उग पा रहे.
ऊंची चोटियों के जंगल भी हो रहे प्रभावित: वहीं दूसरी तरफ ऊंची चोटियों वाले जंगल ज्यादा सुरक्षित पाए गए, लेकिन गर्मियों में जब लोग ऊंचाई वाले इलाकों में जाते हैं तो वहा टेंपरेरी झोपड़ियां बनाते हैं. ऐसे में अब ऊंची चोटियों वाले जंगलों में भी दबाव बढ़ रहा है. इन झोपड़ियों के लिए हिमालयी फर और खरसू जैसे पेड़ों की लकड़ी का इस्तेमाल होता है.
अध्ययन में हर हेक्टेयर में पेड़ों, छोटे पौधों और बीजों की संख्या में काफी अंतर देखा गया. हर हेक्टेयर में 2 से 20 प्रजातियों के 411 से 840 बड़े पेड़ पाए गए. इसी तरह हर हेक्टेयर में 2 से 15 प्रजातियों के 587 से 3655 छोटे पौधे पाए गए. इसके अलावा हर हेक्टेयर में 2 से 10 प्रजातियों के 944 से 6,572 बीज से नन्हे पौधे निकले पाए गए. यानी सबसे ज्यादा पेड़ कम प्रभावित जंगलों में मिले, जबकि ज्यादा प्रभावित जंगलों में पौधों की संख्या काफी कम थी.
41 में से 22 फीसदी प्रजातियों का पुनर्जनन नहीं हो रहा: अध्ययन में बीज से निकले पौधों और छोटे पौधों के बीच रिलेशन देखा गया, जहां बीज वाले पौधे ज्यादा थे, वहां छोटे पौधे भी ज्यादा मिले. लेकिन कई जगहों पर बीज से छोटा पौधा और छोटे पौधे से बड़ा पेड़ बनने की प्रक्रिया कमजोर पाई गई. अध्ययन के दौरान 41 प्रजातियों में से 22 फीसदी का पुनर्जनन नहीं होना पाया गया है.
शोधकर्ताओं ने पेड़ों को पांच श्रेणियों में बांटा: इसके लिए शोधकर्ताओं ने पेड़ों के पुनर्जनन (Regeneration) को पांच श्रेणियों में बांटकर जानकारी साझा की है, जिसके अनुसार अच्छा पुनर्जनन श्रेणी में 34.25 फीसदी प्रजातियां, सामान्य पुनर्जनन श्रेणी में 12.33 फीसदी, कमजोर पुनर्जनन श्रेणी में 16.10 फीसदी, कोई पुनर्जनन नहीं में 22.60 फीसदी. नई जगहों पर बढ़ रही प्रजातियां श्रेणी में 14.73 फीसदी पाया गया है. यानी करीब हर पांचवीं प्रजाति ऐसी है, जिसमें बीज और छोटे पौधे नहीं मिले.
इनमें मेपल की कुछ प्रजातियां भोजपत्र, अखरोट, बांज, कैल और पॉपुलर जैसे पेड़ शामिल हैं. इसके साथ ही ज्यादा प्रभावित जंगलों में पेड़ों का कवर, कम प्रभावित जंगलों में पेड़ों के कवर (canopy cover) से 75 फीसदी से ज्यादा थी, जबकि ज्यादा प्रभावित जंगलों में ये 40 फीसदी से भी कम पाई गई.
कैनोपी कवर: अत्यधिक प्रभावित मिश्रित चौड़ी पत्ती वाले वन में कैनोपी कवर (पेड़ों की ऊपरी शाखाओं, टहनियों और पत्तियों द्वारा ऊपर से देखने पर जमीन या जंगल के ऊपर बनने वाली एक ‘छतरी’ या सतत आवरण) करीब 37 फीसदी, देवदार में करीब 29 फीसदी, बांज वन में करीब 37 फीसदी, चीर जंगल में करीब 25 फीसदी रह गया है, जहां पेड़ों के कटे हुए ठूंठ (Tree Stump) ज्यादा मिले, वहां नए पौधे कम थे.
कैनोपी कवर संतुलित होना जरूरी है: पेड़ों की शाखाएं कटने का भी नए पौधों पर बुरा असर पाया गया. एक तरह से देखा जाए तो कैनोपी कवर पुनर्जनन को नियंत्रित करती है. यदि जंगल का कैनोपी कवर अगर बहुत खुला हुआ होता है तो जमीन गर्म और सूखी हो जाती है, जिससे नए पौधे नहीं उग पाते. अगर कैनोपी कवर बहुत घना हो तो जमीन तक रोशनी नहीं पहुंचती, जिससे भी पौधे कमजोर पड़ते हैं. इसलिए कैनोपी कवर संतुलन जरूरी है.
निचले क्षेत्रों में जंगलों की संख्या घटी: रिपोर्ट के अनुसार मध्यम प्रभावित देवदार जंगल में 1,833 बीज वाले पौधे और 1013 छोटे पौधे प्रति हेक्टेयर में मिले, लेकिन जहां दबाव ज्यादा था, यानी निचले क्षेत्रों में ये संख्या काफी घट गई. बांज, मोरू और खरसू का कई जगहों पर पुनर्जनन ठीक-ठाक मिला, लेकिन शोधकर्ताओं ने चेताया कि सिर्फ छोटे पौधे मिलना काफी नहीं है. इन्हें बड़े पेड़ बनने तक सुरक्षा और निगरानी की जरूरत है.
बुरांश के पेड़ों को भी खतरा: बुरांश कई जंगलों में प्रमुख पेड़ के रूप में पाया गया, लेकिन कुछ जगहों पर इसके बीज और छोटे पौधे काफी कम मिले, जिसके पीछे का कारण मानवीय दबाव, बीज न बनना, अंकुरण न होना और शुरुआती अवस्था में पौधों का नष्ट होना शामिल हैं.
थुनेर की स्थिति भी अधिकांश वनों में चिंताजनक: अध्ययन में टैक्सस यानी थुनेर की स्थिति अधिकांश वन क्षेत्रों में चिंताजनक पाई गई. शोधकर्ताओं के अनुसार इसकी कम आबादी के कारण बीज उत्पादन और प्राकृतिक अंकुरण दोनों सीमित हैं. इसके अलावा औषधीय उपयोग के लिए अवैध लॉपिंग, टहनियों और छाल को काटना और कभी-कभी पूरे पेड़ को नुकसान पहुंचाना भी इसकी आबादी को कम कर रहा है. हालांकि, टैक्सस कम रोशनी में भी लंबे समय तक जीवित रह सकता है, लेकिन इसकी नई पौध तैयार होने की दर बहुत कम है. इसलिए इसके मौजूदा पेड़ों और पुनर्जनन वाले स्थानों की अलग से निगरानी करने की जरूरत है.
हर जगह देखने को मिल जलवायु परिवर्तन का असर: स्टडी में ये बात भी सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से भी जंगलों का स्वरूप बदल सकता है. अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन यानी बदलता तापमान, वर्षा और हिमपात भी जंगलों को प्रभावित कर रहे हैं. कुछ प्रजातियां अपनी पुरानी सीमा से ऊपर की ओर बढ़ रही हैं, जबकि कुछ अपनी जगह पर नई पीढ़ी तैयार नहीं कर पा रही हैं. हिमालयी फर, सिल्वर फर, मेपल, भोजपत्र, देवदार, मोरू और बुरांश जैसी प्रजातियां ऊपरी ढलानों की ओर बढ़ सकती हैं. इससे आने वाले समय में भागीरथी कैचमेंट के जंगलों की बनावट बदल सकती है.
एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय उत्तराखंड के शोधकर्ता यशवंत सिंह राणा ने बताया कि,
भागीरथी कैचमेंट के जंगल अभी भी जैव विविधता और पारिस्थितिकी के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी अगली पीढ़ी पर दबाव बढ़ता जा रहा है. सिर्फ बड़े पेड़ों की मौजूदगी से जंगल स्वस्थ नहीं माना जा सकता, बल्कि बीज और छोटे पौधों का लगातार तैयार होना और उनका बड़े पेड़ों में बदलना ही जंगल की असली सेहत का संकेत है.
– यशवंत सिंह राणा, शोधकर्ता –
शोधकर्ता यशवंत सिंह राणा का मानना है कि जिन जंगलों में पुनर्जनन कम या नहीं है, वहां तत्काल कदम उठाने की जरूरत है, नहीं तो जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों की वजह से गढ़वाल हिमालय के कई अहम पेड़ों की संरचना तेजी से बदल सकती है.
साथ ही शोधकर्ता यशवंत सिंह राणा ने बताया कि भागीरथी कैचमेंट के 24 जंगलों का अध्ययन करने के बाद हमने अपनी रिपोर्ट में तमाम सुझाव भी दिए हैं, जिसमें मुख्य रूप से जिन प्रजातियों में पुनर्जनन कमजोर या नहीं है, उनकी अलग से निगरानी की जाए.
स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से देशी प्रजातियों के पौधे लगाए जाएं. अत्यधिक चराई और अवैध कटाई वाले इलाकों में सख्ती की जाए. पेड़ों की शाखाएं काटने और पत्तियों की अत्यधिक सफाई पर रोक लगाई जाए. जंगलों में अस्थायी झोपड़ियों के लिए पेड़ों की कटाई रोकी जाएय आग से प्रभावित इलाकों में नए पौधों की सुरक्षा की जाए. टैक्सस, भोजपत्र, फर और बांज जैसी संवेदनशील प्रजातियों के लिए अलग से संरक्षण की योजना बनाई जाए. वन विभाग, स्थानीय लोग और शोध संस्थान मिलकर लगातार निगरानी करें. इसके अलावा सिर्फ पौधे लगाने तक सीमित न रहें, बल्कि उनके बड़े पेड़ बनने तक देखभाल भी करें
– यशवंत सिंह राणा, शोधकर्ता –
गढ़वाल विश्वविद्यालय का यह अध्ययन चेतावनी देता है कि भागीरथी कैचमेंट के जंगल स्थानीय मानवीय हस्तक्षेप और वैश्विक जलवायु परिवर्तन की दोहरी मार के कारण पुनर्जीवन संकट से जूझ रहे हैं. बढ़ती गर्मी के कारण जहां बेशकीमती पेड़ ऊपरी ढलानों की ओर पलायन कर रहे हैं, वहीं निचले इलाकों में अत्यधिक चराई, वनाग्नि और कटाई के कारण नए पौधे बड़े पेड़ों में तब्दील नहीं हो पा रहे हैं. यदि समय रहते इन प्रभावित क्षेत्रों में इंसानी दखल को रोककर कृत्रिम बीजारोपण जैसे सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो गंगा घाटी का यह मुख्य जलग्रहण क्षेत्र पूरी तरह बंजर हो जाएगा, जिससे नुकसान भविष्य में उठाने पड़ सकते हैं.
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