मजाड़ा (उत्तराखंड)।
जहाँ एक ओर देशभर में दीपावली की तैयारियाँ जोरों पर हैं, वहीं उत्तराखंड के टिहरी जनपद का मजाड़ा गांव इस बार अंधेरे में ही रहेगा। कुछ हफ्ते पहले आई प्राकृतिक आपदा ने इस छोटे से गांव की रौनक ही छीन ली है। न घर बचे, न खेत, और कई परिवार तो अपनों को भी खो चुके हैं। ऐसे में इस बार ना दीये जलेंगे, ना मिठाई बनेगी, और ना ही कोई त्योहार मनाया जाएगा।
प्राकृतिक कहर ने छीना सबकुछ
लगातार हुई भारी बारिश और भूस्खलन के चलते मजाड़ा गांव में कई घर जमींदोज हो गए। कुछ लोग तो जैसे-तैसे जान बचाकर निकले, लेकिन कई परिवारों ने अपने परिजनों को खो दिया। मवेशी, अनाज, सामान — सब कुछ मलबे में दब गया।
दर्द में डूबी दिवाली
गांव के बुजुर्ग गोविंद राम (65) कहते हैं, “पहली बार ऐसा होगा जब दीपावली पर एक भी दीया नहीं जलेगा। अब रोशनी की नहीं, सिर्फ खोए हुए जीवन की यादें रह गई हैं।”
वहीं, महिलाओं और बच्चों की आंखों में आज भी डर और चिंता साफ झलकती है। कई लोग अब भी पास के राहत शिविरों में रह रहे हैं, और गांव पूरी तरह वीरान पड़ा है।
सरकारी मदद नाकाफी
प्रशासन की ओर से कुछ राहत सामग्री जरूर पहुंचाई गई, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार, ये मदद न तो समय पर मिली और न ही पर्याप्त है। पुनर्वास की प्रक्रिया भी धीमी गति से चल रही है, जिससे लोगों में नाराज़गी है।
कोई त्योहार नहीं, बस एक उम्मीद
इस बार मजाड़ा गांव में दीपावली नहीं, बल्कि शोक की चुप्पी छाई हुई है। लोग सिर्फ एक बेहतर कल की उम्मीद में जी रहे हैं — जब फिर से घर बनेंगे, खेत हरे होंगे और बच्चे मुस्कराएंगे।
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