कांग्रेस में हर कोई नेता पार्टी का चेहरा बनना चाहता है। 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में वापसी के दावे कर रही है लेकिन पार्टी में चुनाव वर्ष के शुरूआत में ही जिस तरह की गुटबाजी व नेताओं में बीच एक-दूसरे के प्रति तीखी बयानबाजी हो रही है
प्रदेश की सियासत में जमीनी स्तर पर कांग्रेस का आधार कमजोर हो रहा है लेकिन पार्टी में दिग्गज नेताओं में फेस के लिए संग्राम चल रहा है। हर नेता की कोशिश है कि पार्टी का चेहरा बने। इसके लिए अपने क्षत्रपों से एक-दूसरे की घेराबंदी के लिए फिल्डिंग सजाने पर ज्यादा आमदा हैं। राजनीतिक जानकारों के अनुसार कांग्रेस कैडर आधारित पार्टी नहीं रही है। यही वजह कि अनुशासनहीनता भी दिखाई देती है।
प्रदेश की राजनीति में 2017 और उसके बाद हुए विधानसभा व लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को लगातार करारी हार का सामना करना पड़ा। 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में वापसी के दावे कर रही है लेकिन पार्टी में चुनाव वर्ष के शुरूआत में ही जिस तरह की गुटबाजी व नेताओं में बीच एक-दूसरे के प्रति तीखी बयानबाजी हो रही है। उससे सत्ता में वापस के दावे को हकीकत में बदलना आसान नहीं है। 2027 का चुनाव जिस चेहरे पर लड़ा जाएगा, यह तो हाईकमान तय करेगी लेकिन इसके लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच फेस की लड़ाई दिखाई देने लगी है।
कांग्रेस में आपसी लड़ाई नई बात नहीं
पार्टी हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल कि नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह, चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डा.हरक सिंह रावत, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं सीडब्लूसी सदस्य करन माहरा को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। हरीश रावत ने भी इन पांचों नेताओं को पंचमुखी बता चुके हैं। पार्टी में नेतृत्व को लेकर किसी तरह का संशय न रहे, इसके लिए राजनीति संन्यास व चुनाव न लड़ने की बात कहते आए हैं।
राजनीतिक विश्लेषक जय सिंह रावत का कहना है कि कांग्रेस में आपसी लड़ाई नई बात नहीं है। कांग्रेस नेतृत्व के लिए नेताओं के बीच आपसी मतभेद चरम पर रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि भाजपा या वामपंथी दलों की तरह कांग्रेस कैडर आधारित पार्टी नहीं है। जिस कारण अनुशासनहीनता धरातल पर साफ दिखाई देती है। कांग्रेस को इस समय आपसी लड़ाई से ज्यादा धरातल पर काम करने की जरूरत है।
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